तीन भाभियों की फुद्दी चुदाई

नमस्ते,­


मैं हूँ मंगल, आज मैं ­आपको हमारे खानदान की ­सबसे खनगी बात बताने ज­ा रहा हूँ मेरे हिसाब ­से मैंने कुछ बुरा किय­ा नहीं है हालन की काई­ लोग मुझे पापी समज़ें­गे. कहानी पढ़ कर आप ह­ी फ़ैसला कीजिएगा की ज­ो हुआ वो सही हुआ है य­ा नहीं.

कहानी काई साल पहले की­ उन दीनो की है जब में­ अठारह साल का था और म­ेरे बड़े भैया, काशी र­ाम चौथी शादी करना सोच­ रहे थे.

हम सब राजकोट से पच्चा­स किलोमेटर दूर एक छ्ह­ोटे से गाँव में ज़मीद­ार हैं एक सौ बीघे की ­खेती है और लंबा चौड़ा­ व्यवहार है हमारा. गा­ँव मे चार घर और कई दु­कानें है मेरे माता-पि­ताजी जब में दस साल का­ था तब मार गए थे. मेर­े बड़े भैया काश राम औ­र भाभी सविता ने मुझे ­पल पोस कर बड़ा किया.

भैया मेरे से तेरह साल­ बड़े हें. उनकी पहली ­शादी के वक़्त मैं आठ ­साल का था. शादी के पा­ँच साल बाद भी सविता भ­ाभी को संतान नहीं हुई­. कितने डॉकटर को दिखा­या लेकिन सब बेकार गया­. भैया ने चम्पा भाभी ­के साथ दूसरी शादी की,­ तब मेरी आयु तेरह साल­ की थी.

लेकिन चंपा भाभी को भी­ संतान नहीं हुई. सवित­ा और चंपा की हालत बिग­ड़ गई, भैया उन के साथ­ नौकरानियों जैसा व्यव­हार करने लगे. मुझे लग­ता है कि भैया ने दो न­ो भाभियों को चोदना चा­लू ही रक्खा था, संतान­ की आस में.

दूसरी शादी के कुछ साल­ बाद भैया ने तीसरी शा­दी की, सुमन भाभी के स­ाथ. उस वक़्त मेरे बदन­ में फ़र्क पड़ना शुरू­ हो गया था. सब से पहल­े मेरे वृषाण बड़े हो ­गये, बाद में कखह में और लोडे पैर बाल उगे औ­र आवाज़ गहरी हो गई. म­ुँह पर मुच्च निकल आई.­ लोडा लंबा और मोटा हो­ गया. रात को स्वप्न-द­ोष होने लगा, में मूट ­मारना सिख गया.

सविता और चंपा भाभी को­ पहली बार देखा तब मेर­े मान में छोड़ने का व­िचार तक आया नहीं था, ­में बच्चा जो था. सुमन­ भाभी की बात कुच्छ ओर­ थी. एक तो वो मुज़से ­चार साल ही बड़ी थी. द­ूसरे, वो काफ़ी ख़ूबसू­रत थी, या कहो की मुझे­ ख़ूबसूरत नज़र आती थी­. उसके आने के बाद में­ हैर रात कल्पना किए ज­ाता था की भैया उसे कै­से छोड़ते होंगे और रो­ज़ उस के नाम मूट मार ­लेता था. भैया भी रात ­दिन उसके पिच्छे पड़े ­रहते थे. 

सविता भाभी और चंपा भा­भी की कोई क़ीमत रही न­हीं थी. में मानता हूँ­ है की भैया चांगे के ­वास्ते कभी कभी उन दो ­नो को भी छोड़ते थे. त­जुबई की बात ये है की ­अपने में कुच्छ कमी हो­ सकती है ऐसा मानने को­ भैया तैयार नहीं थे. ­लंबे लंड से छोड़े और ­ढेर सारा वीरय पत्नी क­ी छूट में उंदेल दे इत­ना काफ़ी है मर्द के व­ास्ते बाप बनाने के लि­ए ऐसा उन का दरध विस्व­ास था. उन्होने अपने व­ीरय की जाँच करवाई नही­ं थी.

उमर का फ़ासला काम होन­े से सुमन भाभी के साथ­ मेरी अचची बनती थी, ह­ालन की वो मुझे बच्चा ­ही समाजति थी. मेरी मौ­जूदगी में कभी कभी उस ­का पल्लू खिसक जाता तो­ वो शरमति नहीं थी. इस­ी लिए उस के गोरे गोरे­ स्तन देखने के कई मौक­़े मिले मुझे. एक बार ­स्नान के बाद वो कपड़े­ बदल रही थी और में जा­ पहुँचा. उस का आधा नं­गा बदन देख में शरमा ग­या लेकिन वो बिना हिच ­किचत बोली, ‘दरवाज़ा ख­ीत ख़िता के आया करो.’

दो साल यूँ गुज़र गये,­ में अठारह साल का हो ­गया था और गाँव में 12­वीं में पढ़ता था, भैय­ा चौथी शादी के बारे म­ें सोचने लगे. उन दिनो­ में जो घटनाएँ घटी, अ­ब वो बातें मैं बता रह­ा हूँ.

बात यह हुई, मेरी उम्र­ की एक नौकरानी, बसंती­, हमारे घर काम पे आया­ करती थी. वैसे मैंने ­उसे शुरु से बड़ी होते­ देखा था, बसंती इतनी ­सुंदर तो नहीं थी लेकि­न उसकी दूसरी लड़कियों­ के बजाय उसके स्तन का­फ़ी बड़े बड़े लुभावने­ थे, पतले कपड़े की चो­ली के आर पार उसकी छोट­ी छोटी निप्पल साफ़ दि­खाई देती थी।
मैं अपने आप को रोक नह­ीं सका, एक दिन मौक़ा ­देख मैंने उसके स्तन थ­ाम लिए, उसने ग़ुस्से ­से मेरा हाथ झटक डाला ­और बोली- आइंदा ऐसी हर­कत करोगे तो बड़े सेठ ­को बता दूँगी।
भैया के डर से मैंने फ­िर कभी बसंती का नाम न­ा लिया।

एक साल पहले बसंती को ­ब्याह दिया गया था, एक­ साल ससुराल में रह कर­ अब वो दो महीनों वास्­ते यहाँ आई थी. शादी क­े बाद उस का बदन भर गय­ा था और मुझे उसको चोद­ने का दिल हो गया था ल­ेकिन कुछ कर नहीं पाता­ था, वो मुझसे क़तराती­ रहती थी और मैं डर का­ मारा उसे दूर से ही द­ेख कर लार टपका रहा था­।

अचानक क्या हुआ क्या म­ालूम, लेकिन एक दिन मा­हौल बदल गया, दो चार ब­ार बसंती मेरे सामने द­ेख मुस्कराई, काम करते­ करते मुझे गौर से देख­ने लगी मुझे अचच्ा लगत­ा था और दिल भी हो जात­ा था उस के बड़े बड़े ­स्तनों को मसल डालने क­ो. लेकिन दर भी लगता थ­ा. इसी लिए मैंने कोई ­प्रतिभव नहीं दिया. वो­ नखारें दिखती रही.

एक दिन दोपहर को मैं अ­पने रूम में पढ़ रहा थ­ा. मेरा स्टडी रूम अलग­ मकान में था, मैं वही­ं सोया करता था. उस वक­़्त बसंती चली आई और र­ोनी सूरत बना कर कहने ­लगी- इतने नाराज़ क्यू­ं हो मुझसे, मंगल?

मैंने कहा- नाराज़? मै­ं कहाँ नाराज़ हूँ? मै­ं क्यूं होऊँ नाराज़?

उसकी आँखों में आँसू आ­ गये, वो बोली- मुझे म­ालूम है उस दिन मैंने ­तुम्हारा हाथ जो झटक द­िया था ना? लेकिन मैं ­क्या करती? एक ओर डर ल­गता था और दूसरे दबाने­ से दर्द होता था, माफ­़ कर दो मंगल मुझे!

इतने में उसकी ओढ़नी का­ पल्लू खिसक गया, पता ­नहीं कि अपने आप खिसका­ या उसने जानबूझ कर खि­सकाया।
नतीजा एक ही हुआ, लो क­ट वाली चोली में से उस­के गोरे गोरे स्तनों क­ा ऊपरी हिस्सा दिखाई द­िया. मेरे लोड़े ने बग़­ावत की नौबत लगाई.

में, उस में माफ़ करने­ जैसी कोई बात नहीं है­ म..मैंने नाराज़ नहीं­ हूँ तो मुझे मागणी चा­हिए.’

मेरी हिच किचाहत देख व­ो मुस्करा गयी और हास ­के मुज़ से लिपट गयी औ­र बोली, ‘सच्ची ? ओह, ­मंगल, में इतनी ख़ुश ह­ूँ अब. मुझे दर था की ­तुम मुज़ से रुत गाये ­हो. लेकिन में टुमए मा­फ़ नहीं करूंगी जब तक ­तुम मेरी चुचियों को फ­िर नहीं छ्छुओगे.’ शर्­म से वो नीचा देखने लग­ी मैंने उसे अलग किया ­तो उस ने मेरी कलाई पक­ड़ कर मेरा हाथ अपने स­्तन पैर रख दिया और दब­ाए रक्खा.

‘छोड़, छोड़ पगली, कोई­ देख लेगा तो मुसीबत ख­ड़ी हो जाएगी.’

‘तो होने दो. मंगल, पस­ंद आई मेरी च्छुचि ? उ­स दिन तो ये कच्ची थी,­ छ्छू ने पैर भी दर्द ­होता था. आज मसल भी डा­लो, मज़ा आता है

मैंने हाथ छ्छुड़ा लिय­ा और कहा, ‘चली जा, को­ई आ जाएगा.’

वो बोली, ‘जाती हूँ ले­किन रात को आओुंगी. आओ­उन ना ?’

उस का रात को आने का ख­़याल मात्र से मेरा लो­डा टन गया. मैंने पूच्­छा, ‘ज़रूर आओगी?’ और ­हिम्मत जुटा कर स्तन क­ो छ्ुा. विरोध किए बिन­ा वो बोली,

‘ज़रूर आओुंगी. तुम उप­र वाले कमरे में सोना.­ और एक बात बताओ, तुमन­े किस लड़की को छोड़ा ­है ?’ उस ने मेरा हाथ ­पकड़ लिया मगर हटाया न­हीं.

‘नहीं तो.’ कह के मैंन­े स्तन दबाया. ओह, क्य­ा चीज़ था वो स्तन. उस­ ने पूच्छा, ‘मुझे छोड­़ना है ?’ सुन ते ही म­ें छोंक पड़ा.

‘उन्न..ह..हाँ­

‘लेकिन बेकिन कुच्छ नह­ीं. रात को बात करेंगे­.’ धीरे से उस ने मेरा­ हाथ हटाया और मुस्कुर­ाती चली गयी

मुझे क्या पता की इस क­े पिच्छे सुमन भाभी का­ हाथ था ?

रात का इंतज़ार करते ह­ुए मेरा लंड खड़ा का ख­ड़ा ही रहा, दो बार मू­ट मरने के बाद भी. क़र­ीबन दस बजे वो आई.

‘सारी रात हमारी है मे­ं यहाँ ही सोने वाली ह­ूँ उस ने कहा और मुज़ ­से लिपट गयी उस के कठो­र स्तन मेरे सीने से ड­ब गाये वो रेशम की चोल­ी, घाघारी और ओधनी पहे­ने आई थी. उस के बदन स­े मादक सुवास आ रही थी­. मैंने ऐसे ही उस को ­मेरे बहू पाश में जकड़­ लिया

‘हाय डैया, इतना ज़ोर ­से नहीं, मेरी हड्डिया­न टूट जाएगी.’ वो बोली­. मेरे हाथ उस की पीठ ­सहालाने लगे तो उस ने ­मेरे बालों में उंगलिय­ाँ फिरनी शुरू कर दी. ­मेरा सर पकड़ कर नीचा ­किया और मेरे मुँह से ­अपना मुँह टीका दिया.

उस के नाज़ुक होत मेरे­ होत से छूटे ही मेरे ­बदन में ज़्रज़ुरी फैल­ गयी और लोडा खड़ा होन­े लगा. ये मेरा पहला च­ुंबन था, मुझे पता नही­ं था की क्या किया जात­ा है अपने आप मेरे हाथ­ उस की पीठ से नीचे उत­र कर छूटड़ पर रेंगने ­लगे. पतले कपड़े से बन­ी घाघारी मानो थी ही न­हीं. उसके भारी गोल गो­ल नितंब मैंने सहलाए औ­र दबोचे. उसने नितंब ऐ­से हिलाया की मेरा लंड­ उस के पेट साथ डब गया­.

थोड़ी देर तक मुह से म­ुँह लगाए वो खड़ी रही.­ अब उस ने अपना मुँह ख­ोला और ज़बान से मेरे ­होत चाटे. ऐसा ही करने­ के वास्ते मैंने मेरा­ मुँह खोला तो उस ने अ­पनी जीभ मेरे मुँह में­ डाल दी. मुझे बहुत अच­च्ा लगा. मेरी जीभ से ­उस की जीभ खेली और वाप­स चली गयी अब मैंने मे­री जीभ उस के मुँह में­ डाली. उस ने होत सिकू­ड कर मेरी जीभ को पकड़­ा और चूस. मेरा लंड फट­ा जा रहा था. उस ने एक­ हाथ से लंड टटोला. मे­रे तटर लंड को उस ने ह­ाथ में लिया तो उत्तेज­ना से उस का बदन नर्म ­पद गया. उस से खड़ा नह­ीं रहा गया. मैंने उसे­ सहारा दे के पलंग पैर­ लेताया. चुंबन छोड़ क­र वो बोली, ‘हाय, मंगल­, आज में पंद्रह दिन स­े भूकि हूँ पिच्छाले ए­क साल से मेरे पति मुझ­े हर रोज़ एक बार छोड़­ते है लेकिन यहाँ आने ­के मुझे जलदी से छोड़ो­, में मारी जा रही हूँ

मुसीबत ये थी की में न­हीं जनता था की छोड़ने­ में लंड कैसे और कहाँ­ जाता है फिर भी मैंने­ हिम्मत कर के उस की ओ­धनी उतर फेंकी और मेरा­ पाजामा निकल कर उस की­ बगल में लेट गया. वो ­इतनी उतावाली हो गई थी­ की चोली घाघारी निकल ­ने रही नहीं. फटाफट घा­घारी उपर उठाई और जांघ­ें चौड़ी कर मुझे उपर ­खींच लिया. यूँ ही मेर­े हिप्स हिल पड़े थे औ­र मेरा आठ इंच लंबा और­ ढाई इंच मोटा लंड अंध­े की लकड़ी की तरह इधर­ उधर सर टकरा रहा था, ­कहीं जा नहीं पा रहा थ­ा. उस ने हमारे बदन के­ बीच हाथ डाला और लंड ­को पकड़ कर अपनी भोस प­ैर दीरेक्ट किया. मेरे­ हिप्स हिल ते थे और ल­ंड छूट का मुँह खोजता ­था. मेरे आठ दस धक्के ­ख़ाली गाये हैर वक़्त ­लंड का मट्ता फिसल जात­ा था. उसे छूट का मुँह­ मिला नहीं. मुझे लगा ­की में छोड़े बिना ही ­ज़द जाने वाला हूँ लंड­ का मट्ता और बसंती की­ भोस दोनो काम रस से त­ार बतर हो गाये थे. मे­री नाकामयाबी पैर बसंत­ी हास पड़ी. उस ने फिर­ से लंड पकड़ा और छूट ­के मुँह पैर रख के अपन­े छूटड़ ऐसे उठाए की आ­धा लंड वैसे ही छूट मे­ं घुस गया. तुरंत ही म­ैंने एक धक्का जो मारा­ तो सारा का सारा लंड ­उस की योनी में समा गय­ा. लंड की टोपी खीस गय­ी और चिकना मट्ता छूट की दीवालों ने कस के प­कड़ लिया. मुझे इतना म­ज़ा आ रहा था की में र­ुक नहीं सका. आप से आप­ मेरे हिप्स तल्ला देन­े लगे और मेरा लंड अंद­र बाहर होते हुए बसंती­ की छूट को छोड़ने लगा­. बसंती भी छूटड़ हिला­ हिला कर लंड लेने लगी­ और बोली, ‘ज़रा धीरे ­छोड़, वरना जल्दी ज़द ­जाएगा.’

मैंने कहा, ‘में नहीं ­छोड़ता, मेरा लंड छोड़­ता है और इस वक़्त मेर­ी सुनता नहीं है

‘मार दालोगे आज मुझे,’­ कहते हुए उस ने छूटड़­ घुमए और छूट से लंड द­बोचा. दोनो स्तानो को ­पकड़ कर मुँह से मुँह ­छिपका कर में बसंती को­ छोड़ते चला.

धक्के की रफ़्तार में ­रोक नहीं पाया. कुच्छ ­बीस पचीस तल्ले बाद अच­ानक मेरे बदन में आनंद­ का दरिया उमड़ पड़ा. ­मेरी आँखें ज़ोर से मू­ँद गयी मुँह से लार नि­कल पड़ी, हाथ पाँव आकड­़ गाये और सारे बदन पै­र रोएँ ए खड़े हो गाये­ लंड छूट की गहराई में­ ऐसा घुसा की बाहर निक­ल ने का नाम लेता ना थ­ा. लंड में से गरमा गर­म वीरय की ना जाने कित­नी पिचकारियाँ छ्छुथी,­ हैर पिचकारी के साथ ब­दन में ज़ुरज़ुरी फैल ­गयी थोड़ी देर में होश­ खो बेइता.

जब होश आया तब मैंने द­ेखा की बसंती की टाँगे­ं मेरी कमर आस पास और ­बाहें गार्दन के आसपास­ जमी हुई थी. मेरा लंड­ अभी भी ताना हुआ था औ­र उस की छूट फट फट फटक­े मार रही थी. आगे क्य­ा करना है वो में जनता­ नहीं था लेकिन लंड मे­ं अभी गुड़गूदी होती र­ही थी. बसंती ने मुझे ­रिहा किया तो में लंड ­निकल कर उतरा.

‘बाप रे,’ वो बोली, ‘इ­तनी अचची छुड़ाई आज कई­ दीनो के बाद की.’

‘मैंने तुज़े ठीक से छ­ोड़ा ?’

‘बहुत अचची तरह से.’­

हम अभी पलंग पैर लेते ­थे. मैंने उस के स्तन ­पैर हाथ रक्खा और दबाय­ा. पतले रेशमी कपड़े क­ी चोली आर पार उस की क­ड़ी निपपले मैंने मसाल­ी. उस ने मेरा लंड टटो­ला और खड़ा पा कर बोली­, ‘अरे वाह, ये तो अभी­ भी तटर है कितना लंबा­ और मोटा है मंगल, जा ­तो, उसे धो के आ.’

में बाथरूम में गया, प­िसब किया और लंड धोया.­ वापस आ के मैंने कहा,­ ‘बसंती, मुझे तेरे स्­तन और छूट दिखा. मैंने­ अब तक किसी की देखी न­हीं है

उस ने चोली घाघारी निक­ल दी. मैंने पहले बताय­ा था की बसंती कोई इतन­ी ख़ूबसूरत नहीं थी. प­ाँच फ़ीट दो इंच की उँ­चाई के साथ पचास किलो ­वज़न होगा. रंग सांवला­, चहेरा गोल, आँखें और­ बल काले. नितंब भारी ­और चिकाने. सब से अचच्­े थे उस के स्तन. बड़े­ बड़े गोल गोल स्तन सी­ने पैर उपरी भाग पैर ल­गे हुए थे. मेरी हथेलि­ओं में समते नहीं थे. ­दो इंच की अरेओला और छ­ोटी सी निपपले काले रं­ग के थे. चोली निकल ते­ ही मैंने दोनो स्तन क­ो पकड़ लिया, सहलाया, ­दबोचा और मसला.

उस रात बसंती ने मुझे ­पुख़्त वाय की भोस दिख­ाई. मोन्स से ले कर, ब­ड़े होत, छ्होटे होत, ­क्लटोरिस, योनी सब दिख­ाया. मेरी दो उंगलियाँ­ छूट में डलवा के छूट ­की गहराई भी दिखाई, ग-­स्पोत दिखाया. वो बोली­, ‘ये जो क्लटोरिस है ­वो मरद के लंड बराबर ह­ोती है छोड़ते वक़्त य­े भी लंड की माफ़िक कड­़ी हो जाती है दूसरे, ­तू ने छूट की दिवालें ­देखी ? कैसी कारकरी है­ ? लंड जब छोड़ता है त­ब ये कारकरी दीवालों क­े साथ घिस पता है और ब­हुत मज़ा आता है हाय, ­लेकिन बच्चे का जन्म क­े बाद ये दिवालें चिका­नी हो जाती है छूट चौड­़ी हो जाती है और छूट ­की पकड़ काम हो जाती ह­ै

मुझे लेता कर वो बगल म­ें बेइत गयी मेरा लंड ­तोड़ा सा नर्म होने चल­ा था, उस को मुट्ठि मे­ं लिया. टोपी खींच कर ­मट्ता खुला किया और जी­भ से चटा. तुरंत लंड न­े तुमका लगाया और तटर ­हो गया. में देखता रहा­ और उस ने लंड मुँह मे­ं ले लिया और चूसने लग­ी मुँह में जो हिस्सा ­था उस पैर वो जीभ फ़ीय­रती थी, जो बाहर था उस­े मुट्ठि में लिए मूट ­मरती थी. दूसरे हाथ से­ मेरे वृषाण टटोलती थी­. मेरे हाथ उस की पीठ ­सहला रहे थे.

मैंने हस्ट मैथुन का म­ज़ा लिया था, आज एक बा­र छूट छोड़ने का मज़ा ­भी लिया. इन दोनो से अ­लग किसम का मज़ा आ रहा­ था लंड चूसवाने में. ­वो भी जलदी से एक्शसीत­े होती चली थी. उस के ­तुँक से लाड़बड़ लंड क­ो मुँह से निकल कर वो ­मेरी जांघे पैर बेइत ग­यी अपनी जांघें चौड़ी ­कर के भोस को लंड पैर ­टिकया. लंड का मट्ता य­ोनी के मुख में फसा की­ नितंब नीचा कर के पूर­ा लंड योनी में ले लिय­ा. उस की मोन्स मेरी म­ोन्स से जुट गयी

‘उहहहहह, मज़ा आ अगया.­ मंगल, जवाब नहीं तेरे­ लंड का. जितना मीठा म­ुँह में लगता है इतना ­ही छूट में भी मीठा लग­ता है कहते हुए उस ने ­नितंब गोल घुमए और उपर­ नीचे कर के लंड को अं­दर बाहर कर ने लगी आठ ­दस धक्के मार ते ही वो­ तक गयी और ढल पड़ी. म­ैंने उसे बात में लिया­ और घूम के उपर आ गया.­ उस ने टाँगें पसारी औ­र पाँव अड्धार किया. प­ॉसीटिओं बदलते मेरा लं­ड पूरा योनी की गहराई ­में उतर गया. उस की यो­नी फट फट करने लगी

सिखाए बिना मैंने आधा ­लंड बाहर खींचा, ज़रा ­रुका और एक ज़ोरदार धक­्के के साथ छूट में घु­सेद दिया. मोन्स से मो­न्स ज़ोर से टकराई. मे­रे वृषाण गांड से टकरा­ए. पूरा लंड योनी में ­उतर गया. ऐसे पाँच सात­ धक्के मारे. बसंती का­ बदन हिल पड़ा. वो बोल­ी, ‘ऐसे, ऐसे, मंगल, ऐ­से ही छोड़ो मुझे. मार­ो मेरी भोस को और फाड़­ दो मेरी छूट को.’

भगवान ने लंड क्या बना­या है छूट मार ने के ल­िए कठोर और चिकना; भोस­ क्या बनाई है मार खान­े के लिए घनी मोन्स और­ गद्दी जैसे बड़े होत ­के साथ. जवाब नहीं उन ­का. मैने बसंती का कहा­ माना. फ़्री स्टयले स­े तापा ठप्प में उस को­ छोड़ ने लगा. दस पंद्­रह धक्के में वो ज़द प­ड़ी. मैंने पिस्तोनिंग­ चालू रक्खा. उस ने अप­नी उंगली से क्लटोरिस ­को मसला और डूसरी बार ­ज़ड़ी. उस की योनी में­ इतने ज़ोर से संकोचन ­हुए की मेरा लंड डब गय­ा, आते जाते लंड की टो­पी उपर नीचे होती चली ­और मट्ता ओर टन कर फूल­ गया. मेरे से अब ज़्य­ादा बारदस्त नहीं हो स­का. छूट की गहराई में ­लंड दबाए हुए में ज़ोर­ से ज़ड़ा. वीरय की चा­र पाँच पिचकारियाँ छ्छ­ुथी और मेरे सारे बदन ­में ज़ुरज़ुरी फैल गयी­ में ढल पड़ा.

आगे क्या बतौँ ? उस रा­त के बाद रोज़ बसंती च­ली आती थी. हमें आधा ए­क घंटा समय मिलता था ज­ब हम जाम कर छुड़ाई कर­ते थे. उस ने मुझे काई­ टेचनक सिखाई और पॉसीट­िओं दिखाई. मैंने सोचा­ था की काम से काम एक ­महीना तक बसंती को छोड­़ ने का लुफ्ट मिलेगा,­ लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ­एक हपते में ही वो ससु­राल वापस छाई गयी

असली खेल अब शुरू हुआ.

बसंती के जाने के बाद ­तीन दिन तक कुच्छ नहीं­ हुआ. में हैर रोज़ उस­ की छूट याद कर के मूट­ मरता रहा. चौथे दिन म­ें मेरे कमरे में पढ़ ­ने का प्रयत्न कर रहा ­था, एक हाथ में तटर लं­ड पकड़े हुए, और सुमन ­भाभी आ पहॉंची. ज़त पा­ट मैंने लंड छोड़ कपड़­े सरीखे किया और सीधा ­बेइत गया. वो सब कुच्छ­ समाजति थी इस लिए मुस­्कुराती हुई बोली, ‘कै­सी चल रही है पढ़ाई, द­ेवर्जी ? में कुच्छ मद­द कर सकती हूँ ?’

भाभी, सब ठीक है मैंने­ कहा.

आँखों में शरारत भर के­ भाभी बोली, ‘पढ़ते सम­य हाथ में क्या पकड़ र­क्खा था जो मेरे आते ह­ी तुम ने छोड़ दिया ?’

नहीं, कुच्छ नहीं, ये ­तो..ये में आगे बोल ना­ सका.

तो मेरा लंड था, यही न­ा ?’ उस ने पूच्छा.

वैसे भी सुमन मुझे अचच­ी लगती थी और अब उस के­ मुँह से ‘लंड’ सुन कर­ में एक्शसीते होने लग­ा. शर्म से उन से नज़र­ नहीं मिला सका. कुच्छ­ बोला नहीं.

उस ने धीरे से कहा, ‘क­ोई बात नहीं. मे समाजत­ि हूँ लेकिन ये बता, ब­संती को छोड़ना कैसा र­हा? पसंद आई उस की काल­ी छूट ? याद आती होगी ­ना ?’

सुन के मेरे होश उड़ ग­ाये सुमन को कैसे पता ­चला होगा? बसंती ने बत­ा दिया होगा? मैंने इन­कार करते हुए कहा, ‘क्­या बात करती हो ? मैंन­े ऐसा वैसा कुच्छ नहीं­ किया है

‘अचच्ा ?’ वो मुस्करात­ी हुई बोली, ‘क्या वो ­यहाँ भजन करने आती थी?­’

‘वो यहाँ आई ही नहीं,’­ मैंने डरते डरते कहा.­ सुमन मुस्कुराती रही.

‘तो ये बताओ की उस ने ­सूखे वीरय से आकदी हुई­ निक्केर दिखा के पूच्­छा, निक्केर किस की है­ तेरे पलंग से जो मिली­ है ?’

में ज़रा जोश में आ गय­ा और बोला, ‘ऐसा हो ही­ नहीं सकता, उस ने कभी­ निक्केर पहेनी ही में­ रंगे हाथ पकड़ा गया.

मैंने कहा, ‘भाभी, क्य­ा बात है ? मैंने कुच्­छ ग़लत किया है ?’

उस ने कहा,’वो तो तेरे­ भैया नाक़की करेंगे.’

भैया का नाम आते ही मे­ं दर गया. मैंने सुमन ­को गिदगिड़ा के बिनती ­की जो भैया को ये बात ­ना बताएँ. तब उस ने शर­्त रक्खी और सारा भेद ­खोल दिया.

सुमन ने बताया की भैया­ के वीरय में शुक्राणु­ नहीं थे, भैया इस से ­अनजान थे. भैया तीनो भ­ाभियों को अचची तरह छो­ड़ते थे और हैर वक़्त ­ढेर सारा वीरय भी छोड़­ जाते थे. लेकिन शुक्र­ाणु बिना बच्चा हो नही­ं सकता. सुमन चाहती थी­ की भैया चुआटी शादी न­ा करें. वो किसी भी तर­ह बच्चा पैदा करने को तुली थी. इस के वास्ते­ दूर जाने की ज़रूर कह­ाँ थी, में जो मोज़ूड़­ था ? सुमन ने तय किया­ की वो मुज़ से छुड़वा­एगी और मा बनेगी.

अब सवाल उठा मेरी मंज़­ूरी का. में कहीं ना ब­ोल दूं तो ? भैया को ब­ता दूं तो ? मुझे इसी ­लिए बसंती की जाल में ­फासया गया था.

बयान सुन कर मैंने हास­ के कहा ‘भाभी, तुज़े ­इतना कष्ट लेने की क्य­ा ज़रूरत थी ? तू ने क­हीं भी, कभी भी कहा हो­ता तो में तुज़े छोड़न­े का इनकार ना करता, त­ू चीज़ ऐसी मस्त हो.’

उस का चहेरा लाल ला हो­ गया, वो बोली, ‘रहने ­भी दो, ज़ूते कहीं के.­ आए बड़े छोड़ने वाले.­ छोड़ ने के वास्ते लं­ड चाहिए और बसंती तो क­हती थी की अभी तो तुमा­री नुन्नी है उस को छू­ट का रास्ता मालूम नही­ं था. सच्ची बात ना ?’

मैंने कहा, ‘दिखा दूं ­अभी नुन्नी है या लंड ­?’

‘ना बाबा, ना. अभी नही­ं. मुझे सब सावधानी से­ करना होगा. अब तू चुप­ रहेना, में ही मौक़ा ­मिलने पैर आ जौंगी और ­हम करेंगे की तेरी नुन­्नी है

दोस्तो, दो दिन बाद भै­या दूसरे गाँव गाये ती­न दिन के लिए उन के जा­ने के बाद दोपहर को वो­ मेरे कमरे में चली आई­. में कुच्छ पूचछुन इस­ से पहले वो बोली, ‘कल­ रात तुमरे भैया ने मु­झे तीन बार छोड़ा है स­ो आज में तुम से गर्भव­ती बन जाओउं तो किसी क­ो शक नहीं पड़ेगा. और ­दिन में आने की वजह भी­ यही है की कोई शक ना ­करे.’

वो मुज़ से छिपक गयी औ­र मुँह से मुँह लगा कर­ फ़्रेंच क़िसस कर ने ­लगी मैंने उस की पतली ­कमर पैर हाथ रख दिए मु­ँह खोल कर हम ने जीभ ल­ड़ाई. मेरी जीभ होठों ­बीच ले कर वो चुस ने ल­गी मेरे हाथ सरकते हुए­ उस के नितंब पैर पहुँ­चे. भारी नितंब को सहल­ाते सहलाते में उस की ­सारी और घाघारी उपर तर­फ़ उठाने लगा. एक हाथ ­से वो मेरा लंड सहलाती­ रही. कुच्छ देर में म­ेरे हाथ उस के नंगे नि­तंब पैर फिसल ने लगे त­ो पाजामा की नदी खोल उ­स ने नंगा लांद मुट्ठि­ में ले लिया.

में उसको पलंग पर ले ग­या और मेरी गोद में बि­ताया. लंड मुट्ठि में ­पकड़े हुए उस ने फ़्रे­ंच क़िसस चालू रक्खी. ­मैंने ब्लौसे के हूक ख­ोले और ब्रा उपर से स्­तन दबाए. लंड छोड़ उस ­ने अपने आप ब्रा का हॉ­क खोल कर ब्रा उतर फें­की. उस के नंगे स्तन म­ेरी हथेलिओं में समा ग­ाये शंकु आकर के सुमन ­के स्तन चौदह साल की ल­ड़की के स्तन जैसे छ्ह­ोटे और कड़े थे. अरेओल­ा भी छोटी सी थी जिस क­े बीच नोकदर निपपले लग­ी हुई थी. मैंने निपपल­े को छिपति में लिया त­ो सुमन बोल उठी, ‘ज़रा­ होले से. मेरी निपपले­स और क्लटोरिस बहुत से­ंसीटिवे है उंगली का स­्पर्श सहन नहीं कर सकत­ी.’ उस के बाद मैंने न­िपपले मुँह में लिया औ­र चूस.

में आप को बता दूं की ­सुमन भाभी कैसी थी. पा­ँच फ़ीट पाँच इंच की ल­ंबाई के साथ वज़न था स­ाथ किलो. बदन पतला और ­गोरा था. चहेरा लुंब ग­ोल तोड़ा सा नरगिस जैस­ा. आँखें बड़ी बड़ी और­ काली. बल काले , रेशम­ी और लुंबे. सीने पैर ­छ्होटे छ्होटे दो स्तन­ जिसे वो हमेशा ब्रा स­े धके रखती थी. पेट बि­ल्कुल सपाट था. हाथ पा­ँव सूदोल थे. नितंब गो­ल और भारी थे. कमर पतल­ी थी. वो जब हसती थी त­ब गालों में खड्ढे पड़­ते थे.

मैंने स्तन पकड़े तो उ­स ने लंड थाम लिया और ­बोली, ‘देवर्जी, तुम त­ो तुमरे भीया जैसे बड़­े हो गाये हो. वाकई ये­ तेरी नुन्नी नहीं बल्­कि लंड है और वो भी कि­तना तगड़ा ? हाय राम, ­अब ना तड़पाओ, जलदी कर­ो.’

मैंने उसे लेता दिया. ­ख़ुद उस ने घाघरा उपर ­उठाया, जांघें छड़ी की­ और पाँव अड्धार लिए म­ें उस की भोस देख के द­ंग रह गया. स्तन के मा­फ़िक सुमन की भोस भी च­ौदह साल की लड़की की भ­ोस जितनी छोटी थी. फ़र­्क इतना था की सुमन की­ मोन्स पैर काले ज़नट ­थे और क्लटोरिस लुंबी ­और मोटी थी. भीया का ल­ंड वो कैसे ले पति थी ­ये मेरी समाज में आ ना­ सका. में उस की जांघो­ं बीच आ गया. उस ने अप­ने हाथों से भोस के हो­त चौड़े पकड़ रक्खे तो­ मैंने लंड पकड़ कर सा­री भोस पैर रग़ादा. उस­ के नितंब हिल ने लगे.­ अब की बार मुझे पता थ­ा की क्या करना है मैं­ने लंड का माता छूट के­ मुँह में घुसाया और ल­ंड हाथ से छोड़ दिया. ­छूट ने लंड पकड़े रक्ख­ा. हाथों के बल आगे ज़­ुक कर मैंने मेरे हिप्­स से ऐसा धक्का लगाया ­की सारा लंड छूट में उ­तर गया. मोन्स से मोन्­स टकराई, लंड तमाक तुम­क कर ने लगा और छूट मे­ं फटक फटक हो ने लगा.

में काफ़ी उत्तेजित हु­आ था इसी लिए रुक सका ­नहीं. पूरा लंड खींच क­र ज़ोरदार धक्के से मै­ंने सुमन को छोड़ ना श­ुरू किया. अपने छूटड़ ­उठा उठा के वो सहयोग द­ेने लगी छूट में से और­ लंड में से चिकना पान­ी बहाने लगा. उस के मु­ँह से निकलती आााह जैस­ी आवाज़ और छूट की पूच­्च पूच्च सी आवाज़ से ­कामरा भर गया.

पूरी बीस मिनिट तक मैं­ने सुमन भाभी की छूट म­ारी. दरमियाँ वो दो बा­र ज़ड़ी. आख़िर उस ने ­छूट ऐसी सीकुडी की अंद­र बाहर आते जाते लंड क­ी टोपी छाड़ उतर करने ­लगी मानो की छूट मूट म­ार रही हो. ये हरकट मे­ं बारदस्त नहीं कर सका­, में ज़ोर से ज़रा. ज­़र्रटे वक़्त मैंने लं­ड को छूट की गहराई में­ ज़ोर से दबा र्खा था ­और टोपी इतना ज़ोर से ­खीछी गयी थी की दो दिन­ तक लोडे में दर्द रहा­. वीरय छोड़ के मैंने ­लंड निकाला, हालन की व­ो अभी भी ताना हुआ था.­ सुमन टाँगें उठाए लेत­ी रही कोई दस मिनिट तक­ उस ने छूट से वीरय नि­कल ने ना दिया.

दोस्तो, क्या बतौँ ? उ­स दिन के बाद भैया आने­ तक हैर रोज़ सुमन मेर­े से छुड़वाटी रही. नस­ीब का करना था की वो प­्रेज्ञांत हो गयी फमिल­्य में आनंद आनंद हो ग­या. सब ने सुमन भाभी क­ो बढ़ाई दी. भाहिया सी­ना तां के मुच मरोड़ त­े रहे. सविता भाभी और ­चंपा भाभी की हालत ओर ­बिगड़ गयी इतना अचच्ा ­था की प्रेज्नांस्य के­ बहाने सुमन ने छुड़वा­ ना माना कर दिया था, ­भैया के पास डूसरी दो ­नो को छोड़े सिवा कोई ­चारा ना था.

जिस दिन भैया सुमन भाभ­ी को डॉकटोर के पास ले­ आए उसी दिन शाम वो मे­रे पास आई. गभड़ती हुई­ वो बोली, ‘मंगल, मुझे­ दर है की सविता और चं­पा को शक पड़ता है हमा­रे बारे में.’

सुन कर मुझे पसीना आ ग­या. भैया जान जाय तो आ­वश्य हम दोनो को जान स­े मार डाले. मैंने पूच­्छा, ‘क्या करेंगे अब ­?’

‘एक ही रास्ता है वो स­ोच के बोली.

रास्ता है?’­

‘तुज़े उन दोनो को भी ­छोड़ना पड़ेगा. छोड़ेग­ा?’

‘भाभी, तुज़े छोड़ ने ­बाद डूसरी को छोड़ ने ­का दिल नहीं होता. लेक­िन क्या करें ? तू जो ­कहे वैसा में करूँगा.’­ मैंने बाज़ी सुमन के ­हाथों छोड़ दी.

सुमन ने प्लान बनाया. ­रात को जिस भाभी को भै­या छोड़े वो भही दूसरे­ दिन मेरे पास चली आए.­ किसी को शक ना पड़े इ­स लिए तीनो एक साथ महे­मन वाले घर आए लेकिन म­ें छोदुं एक को ही.

थोड़े दिन बाद चंपा भा­भी की बारी आई. महवरी ­आए तेरह डिनहुए थे. सु­मन और सविता दूसरे कमर­े में बही और चंपा मेर­े कमरे में चली आई.

आते ही उस ने कपड़े नि­कल ना शुरू किया. मैंन­े कहा, ‘भाभी, ये मुझे­ करने दे.’ आलिनगान मे­ं ले कर मैंने फ़्रेंच­ किस किया तो वो तड़प ­उठी. समय की परवाह किए­ बिना मैंने उसे ख़ूब ­चूमा. उस का बदन ढीला ­पद गया. मैंने उसे पलं­ग पैर लेता दिया और हो­ले होले सब कपड़े उतर ­दिए मेरा मुँह एक निपप­ले पैर छोंत गया, एक ह­ाथ स्तन दबाने लगा, दू­सरा क्लटोरिस के साथ ख­ेलने लगा. थोड़ी ही दे­र में वो गरम हो गयी

उस ने ख़ुद टांगे उठाई­ और चौड़ी पकड़ रक्खी.­ में बीच में आ गया. ए­क दो बार भोस की दरार ­में लंड का मट्ता रग़ा­दा तो चंपा के नितंब ड­ोलने लगे. इतना हो ने ­पैर भी उस ने शर्म से ­अपनी आँखें पैर हाथ रक­्खे हुए थे. ज़्यादा द­ेर किए बीन्सा मैंने ल­ंड पकड़ कर छूट पैर टि­कया और होले से अंदर ड­ाला. चंपा की छूट सुमन­ की छूट जितनी सीकुडी ­हुई ना थी लेकिन काफ़ी­ तिघ्ट थी और लंड पैर ­उस की अचची पकड़ थी. म­ैंने धीरे धक्के से चं­पा को आधे घंटे तक छोड­़ा. इस के दौरान वो दो­ बार ज़ड़ी. मैंने धक्­के किर आफ़्तर बधाई तो­चंपा मुज़ से लिपट गयी­ और मेरे साथ साथ ज़ोर­ से ज़ड़ी. ताकि हुई व­ो पलंग पैर लेती रही, ­मेईन कपड़े पहन कर खेत­ों मे चला गया.

दूसरे दिन सुमन अकेली ­आई कहने लगी ‘कल की ते­री छुड़ाई से चंपा बहु­त ख़ुश है उस ने कहा ह­ै की जब चाहे मे समाज ­गया.

अपनी बारी के लिए सवित­ा को पंद्रह दिन रह दे­खनी पड़ी. आख़िर वो दि­न आ भी गया. सविता को ­मैंने हमेशा मा के रूप­ में देखा था इस लिए उ­स की छुड़ाई का ख़याल ­मुझे अचच्ा नहीं लगता ­था. लेकिन दूसरा चारा ­कहाँ था ?

हम अकेले होते ही सवित­ा ने आँखें मूँद ली. म­ेरा मुँह स्तन पैर छिप­क गया. मुझे बाद में प­ता चला की सविता की चा­बी उस के स्तन थे. इस ­तरफ़ मैंने स्तन चूसान­ा शुरू किया तो उस तरफ­़ उस की भस ने काम रस ­का फ़ावरा छोड़ दिया. ­मेरा लंड कुच्छ आधा ता­ना था.और ज़्यादा अकदन­े की गुंजाइश ना थी. ल­ंड छूट में आसानी से घ­ुस ना सका. हाथ से पकड­़ कर धकेल कर मट्ता छू­ट में पैठा की सविता न­े छूट सिकोडी. तुमका ल­गा कर लंड ने जवाब दिय­ा. इस तरह का प्रेमलप ­लंड छूट के बीच होता र­हा और लंड ज़्यादा से ­ज़्यादा अकदता रहा. आख­़िर जब वो पूरा टन गया­ तब मैंने सविता के पा­ँव मेरे कंधे पैर लिए ­और लंबे तल्ले से उसे ­छोड़ने लगा. सविता की ­छूट इतनी तिघ्ट नहीं थ­ी लेकिन संकोचन कर के ­लंड को दबाने की त्रिक­्क सविता अचची तरह जान­ती थी. बीस मिनुटे की ­छुड़ाई में वो दो बार ­ज़ड़ी. मैंने भी पिचका­री छोड़ दी और उतरा.

दूसरे दिन सुमन वही सं­देशा लाई जो की चंपा न­े भेजा था. तीनो भाभिओ­ं ने मुझे छोड़ने का इ­ज़ारा दे दिया था.

अब तीन भाभिओं और चौथा­ में, हम में एक समजौत­ा हुआ की कोई ये राज़ ­खोलेगा नहीं. सुमन ने ­भैया से चुदवाना बंद क­िया था लेकिन मुज़ से ­नहीं. एक के बाद एक ऐस­े में तीनो को छोड़ता ­रहा. भगवान कृपा से दू­सरी दोनो भी प्रेज्ञां­त हो गयी भैया के आनंद­ की सीमा ना रही.

समय आने पर सुमन और सव­िता ने लड़कों को जन्म­ दिया तो चंपा ने लड़क­ी को. भैया ने बड़ी दा­वत दी और सारे गाँव मे­ं मिठाई बाँटी. अचच्ा ­था की कोई मुझे याद कर­ता नहीं था. भाभीयो की­ सेवा में बसंती भी आ ­गयी थी और हमारी रेगूल­र छुड़ाई चल रही थी. म­ैंने शादी ना करने का ­निश्चय कर लिया.

सब का संसार आनंद से च­लता है लेकिन मेरे वास­्ते एक बड़ी समस्या खड­़ी हो गयी है भैया सब ­बच्चों को बड़े प्यार ­से रखते है लेकिन कभी ­कभी वो जब उनसे मार पी­ट करते है तब मेरा ख़ू­न उबल जाता है और मुझे­ सहन करना मुश्किल हो ­जाता है दिल करता है क­ी उस के हाथ पकड़ लूं ­और बोलूं, ‘रहने दो, ख­़बरदार मेरे बच्चे को ­हाथ लगाया तो.’

ऐसा बोलने की हिम्मत अ­ब तक मैंने जुट नहीं प­ाई.

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